हिन्दी साहित्य के कवियों की राष्ट्रीय भावना
शैलेन्द्र कुमार ठाकुर
सहायक प्रध्यापक] हिन्दी डॉ. खूबचंद बघेल शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिलाई & 3 दुर्ग ।
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ABSTRACT:
भारतीय साहित्य में राष्ट्रवाद का अभ्युदय ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद एवं वाल्मीकि रामायण में भी राष्ट्रीय भावधारा का प्रवाह देखने को मिलता है। अंग्रेजों से पूर्व रीतिकालीन साहित्य में भी राष्ट्रीय भावधारा के कवि भूषण ने राष्ट्रीय विचारधारा की रचनाये की। गुलामी के दौर में भारतीय समाज को जगाने के लिए भारतेंन्दु हरिश्चन्द्र ने जिस तरह से साहित्य के माध्यम से समाज को जगाया वह पुनर्जागरण का काल माना जाता है। तदुपरान्त मैथिलीशरण गुप्त, माखन लाल चतुर्वेदी, डॉ. रामधारी सिंह दिनकर, सोहन लाल द्विवेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, रामनरेश त्रिपाठी जैसे राष्ट्रीय विचारधारा के कवियों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं धर्म ध्वजा को फहराने वाली राष्ट्रीय काव्य धारा का सृजन किया जिसका प्रभाव राजनीति एवं भारतीय समाज पर व्यापक रूप से पड़ा। हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय भावधारा का प्रचार दक्षिण के सुब्रमण्यम भारती ने भी व्यापक रूप से किया। वास्तव में देखा जाय तो राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता का भाव दिलो दिमाग को जोड़ते हुए गुलामी के जंजीर को तोड़ने के लिए सबसे बड़ा मंत्र था।
KEYWORDS: भारतीय साहित्य, राष्ट्रीयता का भाव
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राष्ट्रीयता का भाव दिलो दिमाग से उभरता है। आजादी से पूर्व भारतीयों ने जिस तरह की गुलामी सही वह पराधीनता का दर्द उन्हें सदा सालता रहा। 1757 के युद्धोपरान्त भारतीय समाज अंग्रेजों का गुलाम हो गया था। उसके पूर्व भी भारतीय समाज जो सनातनी था वह गुलाम था। सन 1857 के बाद अंग्रेजों ने जिस तरह से शोषण, दमन एवं रक्तपान किया। इस कारण आम भारतीयों में विद्रोह की ज्वाला उभरने लगी थी। जिस प्रकार से अंग्रेजों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ ही साथ भारतीय संस्कृति, लोक परम्पराओं के साथ ही धार्मिक भावनाओें पर प्रहार किया। इससे आम भारतीय दुखी था।
हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चन्द ने जिस तरह से अपनी रचनाओं के माध्यम से भारत के सोये समाज को जगाया वह निःसंदेह ही राष्ट्रीय जनजागरण का पहला प्रयास था। वे लिखते हैं कि -
अंग्रेज राज सुख साज, सबै विधि भारी ।
पैश्धन विदेश चलि जात, यह है ख्वारी ।। 1
इसी से राष्ट्र प्रेम को जन मन में उजागर करने वाले जयशंकर प्रसाद जी ने लिखा है कि -
अरूण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा ।। 2
जयशंकर प्रसाद जी ने इस कविता में भारतीय संस्कृति, समाज के साथ ही साथ हमारे प्राकृतिक एवं भौगोलिक धरोहर को भी महिमामंडित किया है। यही कारण है कि भारत की प्राकृतिक खुबसूरती उन्हें यहॉ खींचकर लाती थी।
राष्ट्रीयता के सवाल पर एक विदेशी विद्वान बुबेकर ने कहा है कि -‘‘साधारण रूप में राष्ट्रीयता देश प्रेम की अपेक्षा देश भक्ति के अधिक व्यापक क्षेत्र की ओर इंगित करती है। राष्ट्रीयता में स्थान के संबंध के साथ-साथ भाषा इतिहास संस्कृति और परम्पराओं के संबंध भी प्रदर्शित होते हैं।‘‘
वास्तव में राष्ट्रीयता दिलो - दिमाग से उपजी एक पवित्र भावना है जो अपनेपन या अपनत्व को विशेष स्थान देती है। जैसे मेरा देश मेरा भारत महान।
वास्तव में राष्ट्र एंव राष्ट्रीयता के लिए एक निश्चित भूभाग के साथ ही एक मानक संस्कृति, धर्म, रीति-रिवाज विचारधारा के साथ ही प्राकृतिक लगाव का होना भी नितान्त जरूरी है। एक राष्ट्र एवं राष्ट्रवादिता दोनो ही एक दूरे के प्रति भावनात्मक लगाव रखते हैं। तभी तो भारतीय चिंतकों ने पूरी धरती को अपना कुटुम्ब माना है। भारतीय संस्कृति का आदर्श वाक्य है। बसुधैव कुटुम्बकम।
साहित्य समाज को जागृत करने वाला सबसे सशक्त साधन है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि सारे मानव समाज को सुन्दर बनाने का नाम साहित्य है। रविन्द्रनाथ ठाकुर ने साहित्य को समाज एवं राष्ट्र को जगाने वाला साधन माना है। जब हमारा देश गुलाम एवं जनता उपेक्षित थी तब देश के साहित्यकारों ने समाज को सचेत करने के लिए उनके गौरव गाथा को सुनाया। उन्हें राम, कृष्ण, दुर्गा, काली, हनुमान की सत साधना से परिचित कराया। वास्तव में साहित्य का काम जन-मन की परिशुद्धि एवं कल्याणकारी भावना से जुड़ी होती है। साहित्य का कार्य हृदय का योग होता है।
भारतीय साहित्यकारों ने अपने-अपने तरीके से अपनी-अपनी भाषा बोली एवं लेखनी द्वारा किसी न किसी रूप में समाज को सचेत करने का काम किया। भारत में भारतीयता का अभाव नहीं था। वह गुलामी के कारण दब सी गयी थी। साहित्यकारों ने राष्ट्रीयता की चिंगारी को धीरे-धीरे जगाया। ऋग्वेद में राष्ट्र की अवधारणा इस रूप में अभिव्यक्त है। इसके एक सूक्त में लिखा है कि - ‘‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता । 9/23 मंडल में। 3 इस राष्ट्रीय भावना का विकास कालान्तर में अथर्ववेद में इस रूप में हुआ। यहॉं पृथ्वी को माता माना गया है। माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्यज्ञं 4 यह भूमि मेरी मॉं है। हम जिस धरती पर भूमि पर निवास करते हैं वहॉं का वन सम्पदा, जल सम्पदा, अन्न भूगर्भ सम्पदा, वहॉं की भाषा संस्कृति हमारी मनोभावनाआंे को तृप्त करती है। विश्व के प्रथम कवि वाल्मीकि का मत है कि
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि ।। 5
यह धरती हमारी मॉं है। हम उसके संतान हैं।
भारतीय समाज को भारतीयता से कवियांे ने समय-समय पर परिचित कराने का काम किया। स्कंदगुप्त नाटक में जयशंकर प्रसाद जी ने लिखा है कि -
अरूण यह मधुमय देश हमारा।
जहॉ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।। 6
इसी तरह से कविवर निराला ने भारतीय अस्मिता को भारतीय गौरव को संस्कृति एवं राष्ट्र धर्म को अपनी रचना के माध्यम से जन मन तक पहुँचाने का कार्य किया। वे लिखते हैं कि -
भारत ही जीवन धन ज्योतिर्मय परम रमण
सर सरिता वन उपवन निराला ने भारत को इस रूप में दर्शाया है ।
बूँद तव पद कमल चित सेवित चरण युगल
मुकुट शुभ्र हिमगर हृदय विच विमल हार
पंच सिन्धु ब्रम्हपुत्र रवि तनया गंगा
विध्य विपिन राजे धन घोरि युगल जंघा 7
भारतीय स्वाभिमान को बढ़ाने का सद कार्य स्वामी विवेकानंद जी ने किया था। उन्होंने भारतीय समाज खासकर हिन्दू समाज को उद्बोधित करते हुए कहा कि ‘‘तुम गर्व से कहो कि तुम हिन्दु हो’’। वास्तव में हिन्दु शब्द हिन्दुस्तानी, भारतीयता एवं आर्यत्व की पहचान का शब्द है।
भारतीय समाज अपनी सोच एवं संकीर्णता के चलते जाति-पाति वर्ण व्यवस्था ऊॅंच-नीच की सोच के कारण स्वरूप कई भागों में विभक्त था। ठाकुर, बाभन, बनिया शुद्र चार पायदान थे। जातियों में बंटा भारतीय समाज पर पहले मुसलमानों ने आघात किया। मंदिर लूटे, मंदिर तोड़े और गुलाम बनाया। उन लोगों से मुक्ति पाने के लिए 1757 में कुछ हिन्दू समाज के लोगों ने अंग्रेजों का साथ दिया था। मीर जाफर की गद्दारी एंवं अंग्रेजों की कूटनीति काम आयी तदुपरान्त भारत के हिन्दु मुस्लिम एवं अन्य धर्मावलम्बी गुलाम बना दिए गए । इस आपदा या विडंबना को देखकर भारतेन्दु हरिश्चन्द जी कहते हैं कि -
रोवहु सब मिलि कै आवहु भारत भाई
हा! हा! भारत दुर्दशा ने देखी जाई ।। 8
भारतेन्दु जी किसी जाति पंथ पर धर्म की बात नहीं कर रहे हैं वे भारत भाई की बात कर रहे हैं । भारतेन्दु हरिश्चन्द की राष्ट्रीयता की प्रतिछाया मैथिलीशरण गुप्त में स्पष्ट दिखाई पड़ती है । वे लिखते हैं कि -
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान
वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक समाज ।।
जो जननी की भी सर्वदा थी पालन करती रही
तू क्यों न हमारी पूज्य हो मातृभूमि मात रही ।। 9
इसी तरह से मैथिलीशरण गुप्त जी भारतीय जनता के लिए आह्वान करते हुए लिखते हैं कि -
हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें आज मिलकर यह समस्याएं सभी।। 10
मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गॉंधी जी ने राष्ट्र कवि नाम से पुकारा था। तदुपरान्त यह संबोधन राष्ट्रीय हुंकार के रूप में जन मन में व्याप्त हो या। गुप्त जी के बाद राष्ट्रीयता का स्वर माखन लाल चतुर्वेदी से संभाला। इन्होंने भारत एवं भारतीयता के साथ ही राष्ट्र के गौरवशाली परम्परा, साहित्य एवं संस्कृति को अपनी रचनाओं का आधार स्तम्भ बनाया। वे लिखते हैं कि -
प्यारे भारत देश
गगन-गगन तेरा यश फहरा
पवन-पवन तेरा बल गहरा
क्षिति जल नभ पर डाल हिंडोले
चरण-चरण संचरण सुनहरा
ओ ऋषियों के त्वेष ।। 11
दूसरी रचना में वे सर्वेश्वर दीनदयाल को यह संदेश पहुँचा रहे हैं कि -
जाओ-जाओ जाओ प्रभु को पहुँचाओ स्वदेश संदेश।
गोली से मारे जाते है। भारतवासी हे र्स्वेश।। 12
भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की आग राष्ट्रवादी कवियों ने लगाई थी। सर्वप्रथम राष्ट्रकवि भूषण ने छत्रपति शिवाजी एवं छत्रसाल के राष्ट्रवाद राष्ट्रप्रेम को अपने काव्य का विषय बनाया था। राष्ट्रीयता की जोश, मशाल उसी समय से जल रही है। वह मशाल भारतेन्दु हरिश्चन्द, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, माखन लाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, राम नरेश त्रिपाठी, गोपाल सिंह नेपाली, सोहन लाल द्विवेदी की रचनाओं में देखी जाती है। दक्षिण भारत के कवि सुब्रमण्यम भारती जी ने भी मॉं भारती का अपनी रचनाओं के द्वारा सुशोभित किया है।
आधुनिक हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना का जो स्वरूप मिलता है वह मूल रूप से राष्ट्रवादी साहित्यकारों ने जगाया था। उनके दिलो दिमाग मे राष्ट्र भक्ति, राष्ट्र प्रेम, मानवीय मूल्य साहित्य संस्कृति एवं धर्म को उत्थान की भाव वृत्ति व्याप्त थी। आधुनिक हिन्दी साहित्य में प्रखर ओजस्वी विद्रोही एवं राष्ट्रवाद से पूर्ण प्रेरित कवि है तो वे राष्ट्रकवि दिनकर जी हैं। उनकी रचना में धर्म, संस्कृति लोक चेतना, लोक राग एवं भारतीय दर्शन की गाथा देखने को मिलती है। भारतीय जनमानस को सचेत करने का कार्य केवल उत्तर ही नहीं दक्षिण भारत के कवियों ने भी किया है। तमिल के सुप्रसिद्ध कवि सुब्रमण्यम भारती ने लिखा है कि -
इसी स्वदेश में मातृ पिता जन पाए आनंद अपार
और हजारों वर्षों तक पूर्वज भी जीते रहे
अमित भाव फूले फले जिनके चिंतन में
यही मुक्त कंठ से वंदना और प्रशंसा करें हम
कह दे वंदेमातरम नमन करे इस देश को 13
सुब्रमण्यम भारती जी अगली कविता में लिखते हैं कि -
चमक उठा उतुंग हिमालय यह नागराज हमारा है
जोड़ नहीं धरती पर जिसका वह नागराज हमारा है
नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस धारा
सम्मानित जो सफल विश्व में महिमा जिसकी बहुत रही है
आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा ।। 14
भारतीय समाज को जगाने के साथ ही साथ आम भारतीयों के मन में भारतीयता का राष्ट्रीयता का स्वर जगाना तो जरूरी था । इस दिशा में राष्ट्रकवि दिनकर ने सोये हुए भारतीयों को जगाते हुए लिखा कि -
जागो! गौतम! जागो महान
जागो, अतीत के क्रान्ति गान
जागो जगती के धर्म तत्व
जागो हे जागो बोधिसत्य ।। 15
वास्तव में देखा जाय तो दिनकर जी का काव्य आम जनमानस में राष्ट्रीयता का भाव भरने वाला है। वे लिखते हैं कि -
दहक रही है मिट्टी स्वदेश की, खौल रहा गंगा का पानी
प्राचीरों में गरज रही है जंजीरों में कसी जवानी ।
अर्पित करो समिध आओ हे समता के अभिमानी
इस कुण्ड से निकलेगी भारत की लाल भवानी ।।
राष्ट्र कवि दिनकर जी राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता को सर्वोपरि रखते हुए लिखते हें कि -
नहीं चाहते किसी देश को हम निज दास बनाना
पर स्वदेश का एक मनुज भी दास न रहेगा ।।
स्वतंत्रता आति की लगन व्यक्ति का धुन है
बाहरी वस्तु नहीं भीतरी गुव है ।। 16
राष्ट्र कवि दिनकर जी भारतीय समाज को अपने देश अपनी धरती अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को याद दिेलाते हुए कहते हैं कि -
ओ भारत की भूमि वंदिनी, ओ जंजीरो वाली
तेरी की क्या कुक्षि फाड़कर जन्मी थी वैशाली ।। 17
भारतीय इतिहास गवाह है कि विश्व का पहला गणतंत्र वैशाली में था। जहॉ की शासन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था सर्वोपरि था। भारतीय साहित्य एवं समाज को परखने के उपरान्त राष्ट्रीय चिंतनधारा के कवियों ने भारतीय समाज को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने के लिए उनके सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक मुख्य धारा से जोड़ने का कार्य किया। इसमें उन्होंने वैदिक काल से चली आ रही चिंतनीय धारा को महत्व दिया। श्रीकृष्ण की गाता का उदाहरण दिया।
निष्कर्ष:-
हिन्दी साहित्य के इतिहास के अवलोकन से निष्कर्ष निकलता है कि कवि भूषण का काव्य से भावना एवं विचार का प्रवाह होने लगा था। कालान्तर में भारतेन्दु हरिश्चन्द की रचनाओं ने भारतीय सयमाज में नवजागरण का मंत्र फूँका। महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय विचार धारा का प्रमुख कवि होने के नाते मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्र कवि से संबोधित किया था। हिन्दी साहित्य के जिन कवियों ने राष्ट्रीयता के स्वर को मुखर किया उसमें माखन लाल चतुर्वेदी, शुभद्रा कुमारी चौहान, सोहन लाल द्विवेदी एवं राष्ट्रकवि से सुशोभित डॉ0 रामधारी सिंह दिनकर जी थे। इन सभी कवियों पर प्रत्यक्षतः स्वामी विवेकानंद जी का प्रभाव था। जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन का बीज सांस्कृतिक धार्मिक एवं साहित्यिक रूप में कर दिया था। निःसंदेह हम कह सकते है कि भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन एवं राष्ट्रीय की शुरूआत स्वामी जी के आध्यात्मिक योगदान स्वरूप परिलक्षित हुआ जिसको कवियों ने अपने काव्य में स्थान देते हुए भारतीय जनमानस में राष्ट्रवाद के भावों को भरने का काम किया।
संदर्भ ग्रन्थ:-
1. भारतेन्दु हरिश्चन्द - भारत दुर्दशा, शुभम पब्लिकेशन, कानपुर प्रथम संस्करण पृ.123
2. जय शंकर प्रसाद - समुद्रगुप्त नाटक से
3. ऋग्वेद 9/23 मंडल से
4. अथर्ववेद 12/1/12 मंडल से
5. वाल्मीकि रामायण से
6. स्कंदगुप्त नाटक - जय शंकर प्रसाद
7. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला - जागो फिर एक बार
8. भारतेन्दु हरिशचन्द - भारत दुर्दशा
9. मैथिलीशरण गुप्त की रचना - भारत भारती
10. वही - भारत भारती
11. माखन लाल चतुर्वेदी
12. सुब्रमण्यम भारती की रचना
13. वही सुब्रमण्यम भारती की रचना
14. राष्ट्र कवि दिनकर की रचना हॅुकार से
15. दिनकर की रचना हॅुकार से पृ. 22-23
16. दिनकर-रेणुका पृ.9
17. समाधेनी रेणुका दिनकर
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Received on 29.03.2025 Revised on 20.04.2025 Accepted on 30.05.2025 Published on 22.08.2025 Available online from September 05, 2025 Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(3):119-124. DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00019 ©A and V Publications All right reserved
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